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न ख़्वाहिश है गदाई की न है अरमान शाही का | शाही शायरी
na KHwahish hai gadai ki na hai arman shahi ka

ग़ज़ल

न ख़्वाहिश है गदाई की न है अरमान शाही का

मारूफ़ देहलवी

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न ख़्वाहिश है गदाई की न है अरमान शाही का
इलाही इश्क़ दे बंदे को महबूब-ए-इलाही का

अगर रक्खे तिरे कूचे की सरहद से क़दम बाहर
गुमाँ फिर ख़िज़्र पर ले जाएँ हम गुम-कर्दा राही का

यहाँ तो दाग़-ए-ख़ूँ दामन से धोया तू ने ऐ हामिल
वहाँ इक दिन खिलेगा गुल हमारी बे-गुनाही का

बहुत आशिक़ तो मक़्तूल-ए-निगाह-ओ-ग़मज़ा हैं लेकिन
ये तेरा नीम-जाँ बिस्मिल है तेरी कम-निगाही का

ग़ुलामी 'ख़ुसरव'-ए-देहली की है 'मारूफ़' फ़ख़्र अपना
कि हम आशिक़ है हम मा'शूक़ महबूब-ए-इलाही का