न ग़म-ए-दिल न फ़िक्र-ए-जाँ है याद
एक तेरी ही बर ज़बाँ है याद
था जो कुछ वादा-ए-वफ़ा हम से
कुछ भी वो तुम को मेहरबाँ है याद
अगले मिलने की तरह भूल गए
क्या बताऊँ तुम्हें कहाँ है याद
हूँ मैं पाबंद-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
कब मुझे बाग़-ओ-बोस्ताँ है याद
महव तेरे ही रू-ओ-ज़ुल्फ़ के हैं
न हमें वो न ये जहाँ है याद
दीदा-ओ-दिल में तू ही बसता है
तुझ सिवा किस की और याँ है याद
और कुछ आरज़ू नहीं 'बेदार'
एक उस की ही जावेदाँ है याद
ग़ज़ल
न ग़म-ए-दिल न फ़िक्र-ए-जाँ है याद
मीर मोहम्मदी बेदार

