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न ग़म-ए-दिल न फ़िक्र-ए-जाँ है याद | शाही शायरी
na gham-e-dil na fikr-e-jaan hai yaad

ग़ज़ल

न ग़म-ए-दिल न फ़िक्र-ए-जाँ है याद

मीर मोहम्मदी बेदार

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न ग़म-ए-दिल न फ़िक्र-ए-जाँ है याद
एक तेरी ही बर ज़बाँ है याद

था जो कुछ वादा-ए-वफ़ा हम से
कुछ भी वो तुम को मेहरबाँ है याद

अगले मिलने की तरह भूल गए
क्या बताऊँ तुम्हें कहाँ है याद

हूँ मैं पाबंद-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
कब मुझे बाग़-ओ-बोस्ताँ है याद

महव तेरे ही रू-ओ-ज़ुल्फ़ के हैं
न हमें वो न ये जहाँ है याद

दीदा-ओ-दिल में तू ही बसता है
तुझ सिवा किस की और याँ है याद

और कुछ आरज़ू नहीं 'बेदार'
एक उस की ही जावेदाँ है याद