न फ़लक होगा न ये कूचा-ए-क़ातिल होगा
मिरे कहने में किसी दिन जो मिरा दिल होगा
जब नुमायाँ वो सवार-ए-रह-ए-मंज़िल होगा
न तो मैं आप में हूँगा न मिरा दिल होगा
आधी रात आ गई बस बस दिल-ए-बेताब सँभल
हम समझते हैं जो इस कर्ब का हासिल होगा
रुख़्सत ऐ वहशत-ए-तन्हाई-ओ-ग़ुर्बत रुख़्सत
ख़ौफ़ ही क्या है जो हमराह मिरे दिल होगा
रात का ख़्वाब नहीं जिस की हर इक दे ताबीर
ये वो अरमान है पूरा जो ब-मुश्किल होगा
तेरा क्या ज़िक्र है ज़िंदाँ की हिलेगी दीवार
नाला-कश जब कोई पाबंद-ए-सलासिल होगा
टाल दीं मैं ने ये कह कह के ज़िदें बचपन की
आइना भी कोई शय है जो मुक़ाबिल होगा
डूबने जाएगा शायद कोई मायूस विसाल
मजमा-ए-आम सुना है लब-ए-साहिल होगा
चौदहवाँ साल उसे देता है मुज़्दा 'आलिम'
ले मुबारक हो कि अब तू मह-ए-कामिल होगा
ग़ज़ल
न फ़लक होगा न ये कूचा-ए-क़ातिल होगा
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी

