न आईना ही उस सूरत के आगे हक्का-बक्का है
सियाही देख उस के ख़त के मद की दिल में लुक्का है
हुआ इंसाँ नुमायाँ नूर-ए-ज़ात-ए-पाक-वहदत से
कि ज्यूँ ख़ुर्शीद के परतव से ज़र्रे में झमक्का है
हुआ अख़बार से साबित सवाब-ए-हज्ज-ए-अकबर है
ज़ियारत कर ले ऐ ग़ाफ़िल दिल-ए-आगाह मक्का है
बचा नीं कोई उस ज़ालिम के जौर-ए-चश्म-ओ-मिज़्गाँ से
वहाँ आईना भी शान-ए-असल का सा शबक्का है
झुका कर एक मैं सर नाम अपना कर दिया रौशन
फ़ुनून-ए-इश्क़ में कम कोई परवाना सा पक्का है
मवाली-ए-अली का है ब-ख़ैर अंजाम बूझ ऐ 'इश्क़'
ख़ुदा हाफ़िज़ तिरा दोज़ख़ भी इक शरई-ए-दिक्का है
ग़ज़ल
न आईना ही उस सूरत के आगे हक्का-बक्का है
इश्क़ औरंगाबादी

