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मुज़्दा ये सबा उस बुत-ए-बे-बाक को पहुँचा | शाही शायरी
muzhda ye saba us but-e-be-bak ko pahuncha

ग़ज़ल

मुज़्दा ये सबा उस बुत-ए-बे-बाक को पहुँचा

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

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मुज़्दा ये सबा उस बुत-ए-बे-बाक को पहुँचा
ये दूद-ए-दिल-ए-सोख़्ता अफ़्लाक को पहुँचा

पैग़ाम ज़बानी तो नसीबों में कहाँ था
नामा भी न तेरा तिरे ग़मनाक को पहुँचा

सद-चाक किया पैरहन-ए-गुल को सबा ने
जब वो न तिरी ख़ूबी-ए-पोशाक को पहुँचा

सहरा में 'हवस' ख़ार-ए-मुग़ीलाँ की मदद से
बारे मिरा ख़ूँ हर ख़स-ओ-ख़ाशाक को पहुँचा