मूसा समझे थे अरमाँ निकल जाएगा
ये ख़बर ही न थी तूर जल जाएगा
मेरी बालीं पे रोने से किया फ़ाएदा
क्या मिरी मौत का वक़्त टल जाएगा
क्या अयादत को उस वक़्त आओगे तुम
जब हमारा जनाज़ा निकल जाएगा
कम-सिनी में ही कहती थी तेरी नज़र
तू जवाँ हो के आँखें बदल जाएगा
सब को दुनिया से जाना है इक दिन 'क़मर'
रह गया आज कोई तो कल जाएगा
ग़ज़ल
मूसा समझे थे अरमाँ निकल जाएगा
क़मर जलालवी

