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मुक़द्दस पत्थरों पर मुद्दआ' रौशन न होने का | शाही शायरी
muqaddas pattharon par muddaa raushan na hone ka

ग़ज़ल

मुक़द्दस पत्थरों पर मुद्दआ' रौशन न होने का

खुर्शीद अकबर

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मुक़द्दस पत्थरों पर मुद्दआ' रौशन न होने का
कहाँ सर फोड़िए अब मोजज़ा रौशन न होने का

भटकता फिर रहा हूँ नफ़्स के अंधे जज़ीरे में
सुना है अपने हिस्से का ख़ुदा रौशन न होने का

सरायत कर गईं ईमान की ख़ुश-फ़हमियाँ ख़ूँ में
दरून-ए-क़ल्ब कोई वसवसा रौशन न होने का

मिरे तलवों पे मसनद हो गए काँटे बयाबाँ के
दिल-ए-वहशत-ज़दा में आबला रौशन न होने का

मैं उस की पहली बारिश बन के पी जाऊँगा चुपके से
नहीं तो इस ज़मीं का ज़ाइक़ा रौशन न होने का