मुक़ाबला हो तो सीने पे वार करता है
वो दुश्मनी भी बड़ी पुर-वक़ार करता है
जो हो सके तो उसे मुझ से दूर ही रखिए
वो शख़्स मुझ पे बड़ा ए'तिबार करता है
नगर में उस की बहुत दुश्मनी के चर्चे हैं
मगर वो प्यार भी दीवाना-वार करता है
मैं जिस ख़याल से दामन-कशीदा रहता हूँ
वही ख़याल मिरा इंतिज़ार करता है
शिकायतें उसे जब दोस्तों से होती है
तो दोस्तों में हमें भी शुमार करता है
ग़ज़ल
मुक़ाबला हो तो सीने पे वार करता है
ख़ालिद महमूद

