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मुंसिफ़-वक़्त से बेगाना गुज़रना होगा | शाही शायरी
munsif-e-waqt se begana guzarna hoga

ग़ज़ल

मुंसिफ़-वक़्त से बेगाना गुज़रना होगा

रूही कंजाही

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मुंसिफ़-वक़्त से बेगाना गुज़रना होगा
फ़ैसला अपना हमें आप ही करना होगा

ज़ख़्म-ए-एहसास कभी चैन न लेने देगा
सर-ए-मैदान-ए-तमन्ना हमें मरना होगा

तुझे छू कर भी तुझे पा न सकेंगे तो हमें
सूरत-ए-दर्द तिरे दिल में उतरना होगा

जाने ले आई कहाँ तेज़ी-ए-रफ़्तार हमें
कि ठहर जाएँ तो सदियों का ठहरना होगा

अस्र-ए-हाज़िर में है जीना ही जिहाद-ए-अकबर
जिस की ख़ातिर हमें हर शय से गुज़रना होगा

हश्र से कम न किसी दिन के झमेले होंगे
इक क़यामत हमें हर शब का गुज़रना होगा

रोएँ क्या डूबते सूरज के लिए हम 'रूही'
कि नई शान से कल उस को उभरना होगा