मुंसिफ़-वक़्त से बेगाना गुज़रना होगा
फ़ैसला अपना हमें आप ही करना होगा
ज़ख़्म-ए-एहसास कभी चैन न लेने देगा
सर-ए-मैदान-ए-तमन्ना हमें मरना होगा
तुझे छू कर भी तुझे पा न सकेंगे तो हमें
सूरत-ए-दर्द तिरे दिल में उतरना होगा
जाने ले आई कहाँ तेज़ी-ए-रफ़्तार हमें
कि ठहर जाएँ तो सदियों का ठहरना होगा
अस्र-ए-हाज़िर में है जीना ही जिहाद-ए-अकबर
जिस की ख़ातिर हमें हर शय से गुज़रना होगा
हश्र से कम न किसी दिन के झमेले होंगे
इक क़यामत हमें हर शब का गुज़रना होगा
रोएँ क्या डूबते सूरज के लिए हम 'रूही'
कि नई शान से कल उस को उभरना होगा
ग़ज़ल
मुंसिफ़-वक़्त से बेगाना गुज़रना होगा
रूही कंजाही

