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मुँह-ज़ोर आरज़ूओं की बे-मेहरियाँ न पूछ | शाही शायरी
munh-zor aarzuon ki be-mehriyan na puchh

ग़ज़ल

मुँह-ज़ोर आरज़ूओं की बे-मेहरियाँ न पूछ

रूही कंजाही

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मुँह-ज़ोर आरज़ूओं की बे-मेहरियाँ न पूछ
बेगाना हो रही हैं ये ला कर कहाँ न पूछ

फ़ेहरिस्त मुहसिनोंं की निहायत तवील है
मुझ से मिरी तबाहियों की दास्ताँ न पूछ

मुझ को पनाह दी न तिरे ग़म ने भी कभी
मैं दे रहा हूँ कितने ग़मों को अमाँ न पूछ

हर ज़ख़्म चंद ज़ख़्मों की करता है परवरिश
कैसे सदा-बहार है ये गुल्सिताँ न पूछ

दश्त-ए-वफ़ा की वुसअ'तों को पा सका है कौन
गुम किस क़दर हुए हैं यहाँ कारवाँ न पूछ

वाबस्ता मोड़ मोड़ से हैं कितने हादसात
ये क़त्ल-गाह है कि दयार-ए-बुताँ न पूछ