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मुमकिन मुझे जो हो बे-रिया हो | शाही शायरी
mumkin mujhe jo ho be-riya ho

ग़ज़ल

मुमकिन मुझे जो हो बे-रिया हो

मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही

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मुमकिन मुझे जो हो बे-रिया हो
मसनद हो कि इस में बोरिया हो

जब क़ाबिल-ए-दीद दिल-रुबा हो
अल्लाह करे कि बा-वफ़ा हो

भेजा नहीं ख़त-ए-शौक़ कब से
मालूम हुआ कि तुम ख़फ़ा हो

बे-ताबी-ए-दिल अगर दिखाऊँ
कोई न किसी का मुब्तला हो

मरता है ज़र पे अहल-ए-दुनिया
नामर्द को कब ख़्वाहिश-ए-तिला हो

मिट्टी कर दे जो आप को तो
नज़रों में ख़ाक कीमिया हो

आई है फ़स्ल-ए-गुल चमन में
ऐ होश-ओ-ख़िरद चलो हवा हो

क्या मुझे दर-ब-दर फिराया
ऐ ख़्वाहिश-ए-दिल तिरा बुरा हो

दिखलाई तू ने यार की शक्ल
ऐ जज़्बा-ए-दिल तिरा भला हो

लिपटो मुझे आ के हिज्र की शब
ऐ गेसू-ए-यार अगर बला हो

ऐ 'मुंतही' बज़्म-ए-यार का हाल
क्या जानिए बा'द मेरे क्या हो