मुझे तो यूँ भी इसी राह से गुज़रना था
दिल-ए-तबाह का कुछ तो इलाज करना था
मिरी नवा से तिरी नींद भी सुलग उठती
ज़रा सा इस में शरारों का रंग भरना था
सुलगती रेत पे यादों के नक़्श क्यूँ छोड़े
तुझे भी गहरे समुंदर में जब उतरना था
मिला न मुझ को किसी से ख़िराज अश्कों में
हवा के हाथों मुझे और कुछ बिखरना था
उसी पे दाग़ हज़ीमत के लग गए देखो
यक़ीं की आग से जिस शक्ल को निखरना था
मैं खंडरों में उसे ढूँडता फिरा 'फ़िक्री'
मगर कहाँ था वो आसेब जिस से डरना था
ग़ज़ल
मुझे तो यूँ भी इसी राह से गुज़रना था
प्रकाश फ़िक्री

