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मुझे रुतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा | शाही शायरी
mujhe rutba-e-gham batana paDega

ग़ज़ल

मुझे रुतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा

फ़ना निज़ामी कानपुरी

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मुझे रुतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा
अगर मेरे पीछे ज़माना पड़ेगा

बहुत ग़म-ज़दा दिल हैं कलियों के लेकिन
उसूलन उन्हें मुस्कुराना पड़ेगा

सुकूँ ढूँडने आए थे मय-कदे में
यहाँ से कहीं और जाना पड़ेगा

ख़बर क्या थी जश्न-ए-बहाराँ की ख़ातिर
हमें आशियाना जलाना पड़ेगा

बहार अब नए गुल खिलाने लगी है
ख़िज़ाँ को चमन में बुलाना पड़ेगा

सुकूत-ए-मुसलसल मुनासिब नहीं है
असीरो तुम्हें ग़ुल मचाना पड़ेगा

'फ़ना' तुम हो शाएर तो अफ़्साना-ए-ग़म
ग़ज़ल की ज़बानी सुनाना पड़ेगा