EN اردو
मुझे मासूमियत से देखता है | शाही शायरी
mujhe masumiyat se dekhta hai

ग़ज़ल

मुझे मासूमियत से देखता है

बिमल कृष्ण अश्क

;

मुझे मासूमियत से देखता है
वो धोका खाए है या दे रहा है

मैं कितना अजनबी हूँ अपनी ख़ातिर
मुझे हर आदमी पहचानता है

अजब है तेरी यक-रंगी कि प्यारे
जहाँ तक देखता हूँ आइना है

हमारी भूक से भूकी है दुनिया
हमारी प्यास से सहरा बना है

निकल भी लो कि इस बस्ती में अक्सर
दरीचों से समुंदर झाँकता है

वो अपने हाथ पर मेहंदी रचा कर
मुक़द्दर की लकीरें ढूँढता है

तिरे होंटों की नम गोलाइयों में
न जाने किस के दुख का ज़ाइक़ा है

कहीं 'पाशी' कहीं 'अल्वी' कहीं 'अश्क'
बस इक दुख है मगर कई तरह का है