मुझे इस का कोई गिला नहीं कि बहार ने मुझे क्या दिया
तिरी आरज़ू तो निकाल दी तिरा हौसला तो बढ़ा दिया
गो सितम ने तेरे हर इक तरह मुझे ना-उमीद बना दिया
ये मिरी वफ़ा का कमाल है कि निबाह कर के दिखा दिया
कोई बज़्म हो कोई अंजुमन ये शिआ'र अपना क़दीम है
जहाँ रौशनी की कमी मिली वहीं इक चराग़ जला दिया
तुझे अब भी मेरे ख़ुलूस का न यक़ीन आए तो क्या करूँ
तिरे गेसुओं को सँवार कर तुझे आइना भी दिखा दिया
मेरी शाइ'री में तिरे सिवा कोई माजरा है न मुद्दआ'
जो तिरी नज़र का फ़साना था वो मिरी ग़ज़ल ने सुना दिया
ये ग़रीब 'आजिज़'-ए-बे-वतन ये ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-अंजुमन
ये ख़राब जिस के लिए हुआ उसी बेवफ़ा ने भुला दिया
ग़ज़ल
मुझे इस का कोई गिला नहीं कि बहार ने मुझे क्या दिया
कलीम आजिज़

