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मुझ सीं और दिलरुबा सीं है अन-बन | शाही शायरी
mujh sin aur dilruba sin hai an-ban

ग़ज़ल

मुझ सीं और दिलरुबा सीं है अन-बन

अब्दुल वहाब यकरू

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मुझ सीं और दिलरुबा सीं है अन-बन
किया करूँ फ़न कुछ आवती नहीं बन

कुछ नहीं आती सर्व-क़द सीं बन
फिरता हों गर्द-बाद जिऊँ बन बन

ज़ुल्फ़ तेरी सियाह नागन है
छीन लेती है हर किसी का मन

दर्स सीं अलम के है दिल बेज़ार
ख़ूब-रूयाँ का ख़ूब है दर्शन

मुझ कूँ वाइज़ नको नसीहत कर
यार जिस सीं मिले बताओ फ़न

यक सू 'यकरू' का हाथ पहुँचता नहीं
क्यूँके पकड़ेगा यार का दामन