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मुझ से मुड़ने की नीं किसी रू से | शाही शायरी
mujhse muDne ki nin kisi ru se

ग़ज़ल

मुझ से मुड़ने की नीं किसी रू से

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

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मुझ से मुड़ने की नीं किसी रू से
चश्म रखता हूँ तेरी अबरू से

अब तो बैठा मैं नक़्श-ए-पा की तरह
कोई उठता है यार की कू से

हुस्न-ए-सीरत है लाज़िम-ए-महबूब
ख़ूबी-ए-गुल है ख़ूबी-ए-बू से

इश्क़ में दर्द से है हुर्मत-ए-दिल
चश्म को आबरू है आँसू से