मुझ से मंसूब है ग़ुबार मिरा
क़ाफ़िले में न कर शुमार मिरा
हर नई शाम मेरी उजरत है
दिन बताना है रोज़गार मिरा
ये तेरी जागती हुई आँखें
इन पे हर ख़्वाब हो निसार मिरा
कौन आता नहीं इधर फिर भी
ध्यान जाता है बार बार मिरा
रात के साथ साथ बढ़ता गया
इन चराग़ों पे ए'तिबार मिरा
वक़्त इतना कहाँ था वक़्त के पास
वर्ना करता वो इंतिज़ार मिरा
क्या अजब है कि सर-बुलंद करे
एक दिन मुझ को इंकिसार मिरा
नींद पर मेरी दस्तरस ग़ाएर
और न ख़्वाबों पे इख़्तियार मिरा
ग़ज़ल
मुझ से मंसूब है ग़ुबार मिरा
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर

