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मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ | शाही शायरी
mujhko jo kahte ho myan tum ho kahan tum ho kahan

ग़ज़ल

मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

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मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ
दिल कहाँ है पास मेरे मेरी जाँ तुम हो कहाँ

वो गली है या परी-ख़ाना है या फ़िरदौस है
सच कहो ऐ हमदमो मैं हूँ कहाँ तुम हो कहाँ

अपने से अपना न हो काम औरों से रखिए उमीद
क्या वसिय्यत करते हो ऐ दोस्ताँ तुम हो कहाँ

गुल खिलेंगे बार बार और आएगी हिर-फिर बहार
है हमेशा सैर-ए-गुलज़ार-ए-जहाँ तुम हो कहाँ

जब जवानी गई रहा क्या आना जाना सब गया
आओ जाने दो वो बातें ऐ मियाँ तुम हो कहाँ

देखने का चाव ये ऐनक उतरती ही नहीं
देखो तुम अपनी तरफ़ ऐ मेहरबाँ तुम हो कहाँ

पूछते हैं हाल तो मुँह देख रहते हो 'रज़ा'
दिल कहीं और ही है सुनते हो मियाँ तुम हो कहाँ