EN اردو
मुद्दतों तक जो पढ़ाया किया उस्ताद मुझे | शाही शायरी
muddaton tak jo paDhaya kiya ustad mujhe

ग़ज़ल

मुद्दतों तक जो पढ़ाया किया उस्ताद मुझे

हफ़ीज़ जालंधरी

;

मुद्दतों तक जो पढ़ाया किया उस्ताद मुझे
इश्क़ में भूल गया कुछ न रहा याद मुझे

क्या मैं दीवाना हूँ या-रब कि सर-ए-राहगुज़र
दूर से घूरने लगते हैं परी-ज़ाद मुझे

अब है आवाज़ की वो शान न बाज़ू की उड़ान
और सय्याद किए देता है आज़ाद मुझे

दाद-ख़्वाही के लिए और तो सामाँ न मिला
नाला-ओ-आह पे रखनी पड़ी बुनियाद मुझे

मेरे शेरों पे वो शरमाए तो अहबाब हँसे
ऐ 'हफ़ीज़' आज ग़ज़ल की ये मिली दाद मुझे