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मुद्दत से है लिबास-ए-बदन तार तार दोस्त | शाही शायरी
muddat se hai libas-e-badan tar tar dost

ग़ज़ल

मुद्दत से है लिबास-ए-बदन तार तार दोस्त

जमील मज़हरी

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मुद्दत से है लिबास-ए-बदन तार तार दोस्त
मैला भी है उतार अब इस को उतार दोस्त

बख़िये की अब जगह है न पैवंद की जगह
क्या सी रहे हैं इस को तिरे ग़म-गुसार दोस्त

था जिस में ज़िंदगी का गुमाँ वो तो जा चुकी
ये ज़िंदगी है उस के क़दम का ग़ुबार दोस्त

जो ज़िंदगी थी लग़्ज़िश-ए-पैहम का सिलसिला
है जुम्बिश-ए-ख़फ़ीफ़ उसे नागवार दोस्त

आगे जो जा चुका है वो हर लम्हा-ए-हयात
तुझ को पुकारता है सुन उस की पुकार दोस्त

हालात ने जो लाद दिया तेरी पीठ पर
गर्दन झटक के फेंक दे जल्दी वो बार दोस्त

थी ज़िंदगी ख़ुदा का ग़ज़ब और 'मज़हरी'
मौत इक ख़ुदा का प्यार है ले उस का प्यार दोस्त