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मुद्दत की तिश्नगी का इनआ'म चाहता हूँ | शाही शायरी
muddat ki tishnagi ka inam chahta hun

ग़ज़ल

मुद्दत की तिश्नगी का इनआ'म चाहता हूँ

हफ़ीज़ बनारसी

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मुद्दत की तिश्नगी का इनआ'म चाहता हूँ
मस्ती भरी नज़र से इक जाम चाहता हूँ

ऐ गर्दिश-ए-ज़माना ज़हमत तो होगी तुझ को
कुछ देर के लिए मैं आराम चाहता हूँ

कल हम से कह रहा था शोहरत-तलब ज़माना
तुम काम चाहते हो मैं नाम चाहता हूँ

सुब्ह-ए-हयात ले ले ऐ ज़ुल्फ़-ए-यार लेकिन
मैं तुझ से इस के बदले इक शाम चाहता हूँ

बाद-ए-सबा से कह दो मेरी तरफ़ भी आए
मैं भी 'हफ़ीज़' उन का पैग़ाम चाहता हूँ