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मुब्तला रूह के अज़ाब में हूँ | शाही शायरी
mubtala ruh ke azab mein hun

ग़ज़ल

मुब्तला रूह के अज़ाब में हूँ

शाहिद इश्क़ी

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मुब्तला रूह के अज़ाब में हूँ
कब से दिल को खुरच रहा है कोई

जाने किस सुब्ह की तमन्ना में
रात-भर शम्अ' साँ जला है कोई

फ़ुर्सत-ए-ज़िंदगी बहुत कम है
और बहुत देर आश्ना है कोई

तुम भी सच्चे हो मैं भी सच्चा हूँ
कब यहाँ झूट बोलता है कोई