मुब्तला रूह के अज़ाब में हूँ
कब से दिल को खुरच रहा है कोई
जाने किस सुब्ह की तमन्ना में
रात-भर शम्अ' साँ जला है कोई
फ़ुर्सत-ए-ज़िंदगी बहुत कम है
और बहुत देर आश्ना है कोई
तुम भी सच्चे हो मैं भी सच्चा हूँ
कब यहाँ झूट बोलता है कोई
ग़ज़ल
मुब्तला रूह के अज़ाब में हूँ
शाहिद इश्क़ी

