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मोहब्बत में दिल-सख़्तियाँ और भी हैं | शाही शायरी
mohabbat mein dil-saKHtiyan aur bhi hain

ग़ज़ल

मोहब्बत में दिल-सख़्तियाँ और भी हैं

रशीद रामपुरी

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मोहब्बत में दिल-सख़्तियाँ और भी हैं
उठाने को संग-ए-गिराँ और भी हैं

धुआँ मेरी आहों का छाया हुआ है
तह-ए-आसमाँ आसमाँ और भी हैं

सताना जलाना ही आता है तुम को
सिवा इस के कुछ ख़ूबियाँ और भी हैं

मिरे दिल को ले कर न पामाल कीजिए
कि इस जिंस के क़द्र-दाँ और भी हैं

अभी तो फ़क़त हिज्र में दिल मिटा है
मगर ख़ाना-वीरानियाँ और भी हैं

तिरा जिन पे लुत्फ़-ओ-करम है ज़ियादा
वो सरगर्म-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं

'रशीद' एक जादू रक़म हैं तो क्या है
तलामीज़-ए-'महमूद' ख़ाँ और भी हैं