मोहब्बत की हरगिज़ नहीं हार होगी
भले लाख दुनियाँ ये दीवार होगी
मोहब्बत नहीं जुर्म कोई जहाँ में
नज़र में वो फिर क्यूँ ख़तावार होगी
भला चैन कैसे मुझे आएगा फिर
नहीं बीच अपने जो तकरार होगी
भरोसा रखोगे ख़ुदा पे जो अपने
तो कश्ती समुंदर से भी पार होगी
यही मैं ने अपने बड़ों से है सीखा
नहीं हौसलों की कभी हार होगी
इस उम्मीद पर जी रही है 'ज्योति'
कभी तो ग़रीबों की सरकार होगी
ग़ज़ल
मोहब्बत की हरगिज़ नहीं हार होगी
ज्योती आज़ाद खतरी

