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मिट्टी था और दूध में गूँधा गया मुझे | शाही शायरी
miTTi tha aur dudh mein gundha gaya mujhe

ग़ज़ल

मिट्टी था और दूध में गूँधा गया मुझे

दानियाल तरीर

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मिट्टी था और दूध में गूँधा गया मुझे
इक चाँद के वजूद में गूँधा गया मुझे

मैं नीस्त और नबूद की इक कैफ़ियत में था
जब वहम-ए-हस्त-ओ-बूद में गूँधा गया मुझे

मैं चश्म-ए-कम-रसा से जिसे देखता न था
उस ख़्वाब-ए-ला-हुदूद में गूँधा गया मुझे

ख़स-ख़ाना-ए-ज़ियाँ की शररबारियों के बा'द
यख़-ज़ार-ए-नार-ए-सूद में गूँधा गया मुझे

इक दस्त-ए-ग़ैब ने मुझे ला चाक पर धरा
फिर वक़्त के जुमूद में गूँधा गया मुझे

इस में तो आसमाँ के शजर भी समर न दें
जिस ख़ाक-ए-बे-नुमूद में गूँधा गया मुझे

क़ौस-ए-क़ुज़ह की सम्त बहुत देखता था मैं
आख़िर गुबार-ओ-दूद में गूँधा गया मुझे