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मिटा सा हर्फ़ हूँ बिगड़ी हुई सी बात हूँ मैं | शाही शायरी
miTa sa harf hun bigDi hui si baat hun main

ग़ज़ल

मिटा सा हर्फ़ हूँ बिगड़ी हुई सी बात हूँ मैं

सिराज लखनवी

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मिटा सा हर्फ़ हूँ बिगड़ी हुई सी बात हूँ मैं
जबीन-ए-वक़्त पे इक नक़्श-ए-बे-सबात हूँ मैं

बता बसीत ज़माने है क्या यही इंसाफ़
जो है अदू-ए-नुमूद-ए-सहर वो रात हूँ मैं

गुमान ये था कि हूँ मरकज़-ए-हुजूम-ए-निगाह
यक़ीन ये है कि महरूम-ए-इल्तिफ़ात हूँ मैं

है किस गुनह की स्याही मिरी ग़लत-फ़हमी
मैं जानता था कि रूह-ए-तजल्लियात हूँ मैं

हर आह-ए-सर्द है उफ़्ताद-ए-अश्क की तफ़्सीर
उखड़ चले हैं क़दम वक़्फ़-ए-हादसात हूँ मैं

पढ़ूँ शिकस्त-ए-अज़ाएम का मर्सिया कब तक
न जाने कब से सिपुर्द-ए-मुक़द्दरात हूँ मैं

ये सब दुरुस्त मगर फिर यही कहूँगा 'सिराज'
ख़ुद इक ज़माना हूँ ख़ुद एक काएनात हूँ मैं