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मिसाल-ए-सैल-ए-बला न ठहरे हवा न ठहरे | शाही शायरी
misal-e-sail-e-bala na Thahre hawa na Thahre

ग़ज़ल

मिसाल-ए-सैल-ए-बला न ठहरे हवा न ठहरे

आफ़ताब इक़बाल शमीम

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मिसाल-ए-सैल-ए-बला न ठहरे हवा न ठहरे
लगाए जाएँ हज़ार पहरे हवा न ठहरे

कहीं कहीं धूप छुप-छुपा कर उतर ही आई
दबीज़ बादल हुए इकहरे हवा न ठहरे

वरक़ जब उल्टे किताब-ए-मौसम दिखाए क्या क्या
गुलाब आरिज़ बदन सुनहरे हवा न ठहरे

वो साँस उमडी कि बे-हिसों ने ग़ज़ब में आ कर
गिरा दिए हब्स के कटहरे हवा न ठहरे

कभी बदन के रुएँ रुएँ में हवास उभरीं
कभी करे गोश होश बहरे हवा न ठहरे

उसी की रफ़्तार-ए-पा से उभरें नुक़ूश-ए-रंगीं
कहीं पे हल्के कहीं पे गहरे हवा न ठहरे

सदा-ए-हर-सू फ़लक के गुम्बद में गूँजती है
हवा न ठहरे हवा न ठहरे हवा न ठहरे