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मिरी ज़िंदगी भी तू है मिरा मुद्दआ' भी तू है | शाही शायरी
meri zindagi bhi tu hai mera muddaa bhi tu hai

ग़ज़ल

मिरी ज़िंदगी भी तू है मिरा मुद्दआ' भी तू है

राम कृष्ण मुज़्तर

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मिरी ज़िंदगी भी तू है मिरा मुद्दआ' भी तू है
मैं तुझी को चाहता हूँ तू ही मेरी आरज़ू है

किसे ढूँढती हैं हर-सू मिरी बे-क़रार नज़रें
तू ये ख़ूब जानता है मुझे किस की जुस्तुजू है

मिरी चश्म-ए-हुस्न ही में तिरे रुख़ की ताबिशें हैं
मिरे हल्क़ा-ए-नज़र में तिरी ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू है

जो करम पे तुम हो माइल तो ये शान है तुम्हारी
न सवाल क्यूँ करूँ मैं कि सवाल मेरी ख़ू है

मिरी रूह ख़ुश है 'मुज़्तर' कि मिरी तलब है सादिक़
जो नज़र से छुप रहा था वही आज रू-ब-रू है