EN اردو
मिरी तरह कोई ना-कामयाब हो न सका | शाही शायरी
meri tarah koi na-kaamyab ho na saka

ग़ज़ल

मिरी तरह कोई ना-कामयाब हो न सका

बिस्मिल सईदी

;

मिरी तरह कोई ना-कामयाब हो न सका
किसी निगाह में भी इंतिख़ाब हो न सका

ख़याल-ओ-ख़्वाब में भी कामयाब हो न सका
मिरा ख़याल कभी उन का ख़्वाब हो न सका

चमन हज़ार ब-रा'नाई-ए-बहार रहा
तुम्हारा हुस्न तुम्हारा शबाब हो न सका

मिरी निगाह के अंदाज़-ए-शौक़ जब देखे
हिजाब कर न सके वो हिजाब हो न सका

जहान-ए-इश्क़ में वो हम-मिज़ाज-ए-फ़ितरत हूँ
मिरे ख़िलाफ़ कोई इंक़लाब हो न सका

कहाँ वो अहद-ए-शबाब और तलातुम-ए-जज़्बात
सुकूँ-पज़ीर कभी इज़्तिराब हो न सका

निगाह-ए-शौक़ से जब तक न छेड़-छाड़ हुई
तिरा शबाब मुकम्मल शबाब हो न सका

निगाह-ए-शोख़ की बेबाकियाँ कोई देखे
कि जैसे कोई कभी कामयाब हो न सका

हरीम-ए-नाज़ की अल्लाह रे रिफ़अतें 'बिस्मिल'
ख़याल में भी कोई बारयाब हो न सका