मिरी जाँ जुदाई न होगी तो होगी
किसी दिन लड़ाई न होगी तो होगी
उन्हें शर्म है और यहाँ शौक़-ए-बेहद
अगर हाथा-पाई न होगी तो होगी
नहीं इतनी जुरअत कि क़दमों पे गिर्ये
कि उन से सफ़ाई न होगी तो होगी
ज़रा जज़्बा-ए-दिल मदद कर ख़ुदारा
जो उन तक रसाई न होगी तो होगी
न कुछ हुस्न ओ ख़ूबी में फ़र्क़ आया होगा
ये दौलत लुटाई न होगी तो होगी
रिहाई असीर-ए-मोहब्बत को तेरे
अगर मौत आई न होगी तो होगी
नए ज़ुल्म ईजाद करते रहो तुम
जहाँ में दुहाई न होगी तो होगी
नहीं बाक ग़ैरों से मिलने में उन को
जो दिल में बुराई न होगी तो होगी
हर इक बात पर आफ़रीं जब कहें सब
तो फिर ख़ुद-सताई न होगी तो होगी
मोहब्बत की जो आँख थी आगे तेरी
जो तू ने चुराई न होगी तो होगी
मोहब्बत का गर खुल गया हाल उन पर
तो 'अंजुम' रुखाई न होगी तो होगी
ग़ज़ल
मिरी जाँ जुदाई न होगी तो होगी
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

