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मिरी बे-रिश्ता-दिली से उसे मज़ा मिल जाए | शाही शायरी
meri be-rishta-dili se use maza mil jae

ग़ज़ल

मिरी बे-रिश्ता-दिली से उसे मज़ा मिल जाए

शाद लखनवी

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मिरी बे-रिश्ता-दिली से उसे मज़ा मिल जाए
जिगर कबाब जो कोई जला-भुना मिल जाए

मुहाल है जो ख़ुदा का दो दूसरा पैदा
जवाब क्या सनम-ए-लाजवाब का मिल जाए

मिले न ईद वो ज़ालिम जो ईद-ए-क़ुर्बां में
गले से तेग़ मिले तेग़ से गला मिल जाए

अ'याल-ओ-माल ने रोका है दम को आँखों में
ये ठग हटें तो मुसाफ़िर को रास्ता मिल जाए

मिलें अ'ली-ओ-मोहम्मद तो रब मिले ऐ 'शाद'
सिवाए संग बुतों के मिले से क्या मिल जाए