मिरा मज़मूँ सवार-ए-तौसन-ए-तब-ए-रवाँ हो कर
ज़मीन-ए-शेर पर फिरता है गोया आसमाँ हो कर
खटक जाते हैं चश्म-ए-बर्क़ में मेरा निशाँ हो कर
ग़ज़ब ढाते हैं या'नी चंद तिनके आशियाँ हो कर
सुन ऐ जोश-ए-जुनूँ तक़लीद-ए-मजनूँ की नहीं अच्छी
मबादा हम भी रह जाएँ किसी दिन दास्ताँ हो कर
दमा-दम शो'बदे हम को दिखाता है कोई जल्वा
कहीं शैख़-ए-हरम हो कर कहीं पीर-ए-मुग़ाँ हो कर
इन आँखों से बहार-ए-बाग़-ए-दुनिया देने वालो
ये आँखें रंग लाएँगी किसी दिन ख़ूँ-फ़िशाँ हो कर
अजी क्या शम्अ' क्या परवाना दोनों जल बुझे आख़िर
कोई आतिश-फ़िशाँ हो कर कोई आतश-बजाँ हो कर
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे ये हसीं दिल ले ही लेते हैं
किसी पर मेहरबाँ हो कर किसी से सरगिराँ हो कर
न पाया और कुछ भी जुज़ ख़ुदा का'बे में ऐ 'अख़्तर'
बहुत नादिम हुए हम बुत-कदे से बद-गुमाँ हो कर
ग़ज़ल
मिरा मज़मूँ सवार-ए-तौसन-ए-तब-ए-रवाँ हो कर
हरी चंद अख़्तर

