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मिरा मज़मूँ सवार-ए-तौसन-ए-तब-ए-रवाँ हो कर | शाही शायरी
mera mazmun sawar-e-tausun-e-tab-e-rawan ho kar

ग़ज़ल

मिरा मज़मूँ सवार-ए-तौसन-ए-तब-ए-रवाँ हो कर

हरी चंद अख़्तर

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मिरा मज़मूँ सवार-ए-तौसन-ए-तब-ए-रवाँ हो कर
ज़मीन-ए-शेर पर फिरता है गोया आसमाँ हो कर

खटक जाते हैं चश्म-ए-बर्क़ में मेरा निशाँ हो कर
ग़ज़ब ढाते हैं या'नी चंद तिनके आशियाँ हो कर

सुन ऐ जोश-ए-जुनूँ तक़लीद-ए-मजनूँ की नहीं अच्छी
मबादा हम भी रह जाएँ किसी दिन दास्ताँ हो कर

दमा-दम शो'बदे हम को दिखाता है कोई जल्वा
कहीं शैख़-ए-हरम हो कर कहीं पीर-ए-मुग़ाँ हो कर

इन आँखों से बहार-ए-बाग़-ए-दुनिया देने वालो
ये आँखें रंग लाएँगी किसी दिन ख़ूँ-फ़िशाँ हो कर

अजी क्या शम्अ' क्या परवाना दोनों जल बुझे आख़िर
कोई आतिश-फ़िशाँ हो कर कोई आतश-बजाँ हो कर

ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे ये हसीं दिल ले ही लेते हैं
किसी पर मेहरबाँ हो कर किसी से सरगिराँ हो कर

न पाया और कुछ भी जुज़ ख़ुदा का'बे में ऐ 'अख़्तर'
बहुत नादिम हुए हम बुत-कदे से बद-गुमाँ हो कर