दामान-ए-कोह में जो में डाढ़ मार रोया
इक अब्र वाँ से उठ कर बे-इख़्तियार रोया
पड़ता न था भरोसा अहद-ए-वٖफ़ा-ए-गुल पर
मुर्ग़-ए-चमन न समझा मैं तो हज़ार रोया
हर गुल ज़मीन याँ की रोने ही की जगह थी
मानिंद-ए-अब्र हर जा मैं ज़ार ज़ार रोया
थी मस्लहत कि रुक कर हिज्राँ में जान दीजे
दिल खोल कर न ग़म में मैं एक बार रोया
इक इज्ज़ इश्क़ इस का अस्बाब-ए-सद-अलम था
कल 'मीर' से बहुत मैं हो कर दो-चार रोया
ग़ज़ल
दामान-ए-कोह में जो में डाढ़ मार रोया
मीर तक़ी मीर

