EN اردو
जब जुनूँ से हमें तवस्सुल था | शाही शायरी
jab junun se hamein tawassul tha

ग़ज़ल

जब जुनूँ से हमें तवस्सुल था

मीर तक़ी मीर

;

जब जुनूँ से हमें तवस्सुल था
अपनी ज़ंजीर-ए-पा ही का ग़ुल था

बिस्तरा था चमन में जों बुलबुल
नाला सर्माया-ए-तवक्कुल था

यक निगह को वफ़ा न की गोया
मौसम-ए-गुल सफ़ीर-ए-बुलबुल था

उन ने पहचान कर हमें मारा
मुँह न करना इधर तजाहुल था

शहर में जो नज़र पड़ा उस का
कुश्ता-ए-नाज़ या तग़ाफ़ुल था

अब तो दिल को न ताब है न क़रार
याद-ए-अय्याम जब तहम्मुल था

जा फँसा दाम-ए-ज़ुल्फ़ में आख़िर
दिल निहायत ही बे-ताम्मुल था

यूँ गई क़द के ख़म हुए जैसे
उम्र इक रहरव सर-ए-पुल था

ख़ूब दरयाफ़्त जो किया हम ने
वक़्त-ए-ख़ुश 'मीर' निकहत-ए-गुल था