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हाल-ए-दिल 'मीर' का रो रो के सब ऐ माह सुना | शाही शायरी
haal-e-dil mir ka ro ro ke sab ai mah suna

ग़ज़ल

हाल-ए-दिल 'मीर' का रो रो के सब ऐ माह सुना

मीर तक़ी मीर

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हाल-ए-दिल 'मीर' का रो रो के सब ऐ माह सुना
शब को अल-क़िस्सा अजब क़िस्सा-ए-जाँ-काह सुना

ना-बलद हो के रह-ए-इश्क़ में पहुँचूँ तो कहीं
हमरा ख़िज़र को याँ कहते हैं गुमराह सुना

कोई इन तौरों से गुज़रे है तिरे ग़म में मिरी
गाह तू ने न सुना हाल मिरा गाह सुना

ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में हैं याँ सब तो अबस जागा 'मीर'
बे-ख़बर देखा उन्हें मैं जिन्हें आगाह सुना