बग़ैर दिल कि ये क़ीमत है सारे आलम की
कसो से काम नहीं रखती जिंस आदम की
कोई हो महरम शोख़ी तिरा तो में पूछूँ
कि बज़्म-ए-ऐश जहाँ क्या समझ के बरहम की
हमें तो बाग़ की तकलीफ़ से मुआ'फ़ रखो
कि सैर-ओ-गशत नहीं रस्म अहल-ए-मातम की
तनिक तो लुत्फ़ से कुछ कह कि जाँ-ब-लब हूँ मैं
रही है बात मिरी जान अब कोई दम की
गुज़रने को तो कज-ओ-वाकज अपनी गुज़रे है
जफ़ा जो उन ने बहुत की तो कुछ वफ़ा कम की
घिरे हैं दर्द-ओ-अलम में फ़िराक़ के ऐसे
कि सुब्ह-ए-ईद भी याँ शाम है महरम की
क़फ़स में 'मीर' नहीं जोश दाग़ सीने पर
हवस निकाली है हम ने भी गुल के मौसम की
ग़ज़ल
बग़ैर दिल कि ये क़ीमत है सारे आलम की
मीर तक़ी मीर

