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आह मेरी ज़बान पर आई | शाही शायरी
aah meri zaban par aai

ग़ज़ल

आह मेरी ज़बान पर आई

मीर तक़ी मीर

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आह मेरी ज़बान पर आई
ये बला आसमान पर आई

आलम-ए-जाँ से तो नहीं आया
एक आफ़त जहान पर आई

पीरी आफ़त है फिर न था गोया
ये बला जिस जवान पर आई

हम भी हाज़िर हैं खींचिए शमशीर
तब्अ' गर इम्तिहान पर आई

तब ठिकाने लगी हमारी ख़ाक
जब तिरे आस्ताँ पर आई

आतिश-ए-रंग-ए-गुल से क्या कहिए
बर्क़ थी आशियाँ पर आई

ताक़त-ए-दिल ब-रंग-ए-निकहत-ए-गुल
फीर अपने मकान पर आई

हो जहाँ 'मीर' और ग़म इस का
जिस से आलम की जान पर आई