दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं
वक़्त मिलने का मगर दाख़िल-ए-अय्याम नहीं
मिस्ल अन्क़ा मुझे तुम दूर से सुन लो वर्ना
नंग-ए-हस्ती हूँ मिरी जाए ब-जुज़ नाम नहीं
ख़तर राह-ए-वफ़ा बल्कि बहुत दूर खिंचा
उम्र गुज़री कि बहम नामा-ओ-पैग़ाम नहीं
राज़-पोशी-ए-मोहब्बत के तईं चाहिए ज़ब्त
सो तो बे-ताबी-ए-दिल बिन मुझे आराम नहीं
बे-क़रारी जो कोई देखे है सो कहता है
कुछ तो है 'मीर' कि इक दम तुझे आराम नहीं
ग़ज़ल
दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं
मीर तक़ी मीर

