जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं
वे रोग अपने जी को नाहक़ बसाहते हैं
उस मय-कदे में हम भी मुद्दत से हैं व-लेकिन
ख़म्याज़ा खींचते हैं हर दम जमाहते हैं
नामूस दोस्ती से गर्दन बंधी है अपनी
जीते हैं जब तलक हम तब तक निबाहते हैं
सहल इस क़दर नहीं है मुश्किल-पसंदी मेरी
जो तुझ को देखते हैं मुझ को सराहते हैं
वे दिन गए कि रातें नालों से काटते थे
बे-डोल 'मीर'-साहिब अब कुछ कराहते हैं
ग़ज़ल
जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं
मीर तक़ी मीर

