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जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं | शाही शायरी
jins-e-giran ko tujhse jo log chahte hain

ग़ज़ल

जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं

मीर तक़ी मीर

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जिंस-ए-गिराँ को तुझ से जो लोग चाहते हैं
वे रोग अपने जी को नाहक़ बसाहते हैं

उस मय-कदे में हम भी मुद्दत से हैं व-लेकिन
ख़म्याज़ा खींचते हैं हर दम जमाहते हैं

नामूस दोस्ती से गर्दन बंधी है अपनी
जीते हैं जब तलक हम तब तक निबाहते हैं

सहल इस क़दर नहीं है मुश्किल-पसंदी मेरी
जो तुझ को देखते हैं मुझ को सराहते हैं

वे दिन गए कि रातें नालों से काटते थे
बे-डोल 'मीर'-साहिब अब कुछ कराहते हैं