EN اردو
मिलते नहीं हो हम से ये क्या हुआ वतीरा | शाही शायरी
milte nahin ho humse ye kya hua watira

ग़ज़ल

मिलते नहीं हो हम से ये क्या हुआ वतीरा

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

;

मिलते नहीं हो हम से ये क्या हुआ वतीरा
मिलने लगा है शायद अब तुम से कोई ख़ीरा

आँखों ही में उड़ाया नक़द-ए-दिल-ओ-जिगर को
वो शोख़ दिल-रुबा है कैसा अठाई-गीरा

उल्फ़त का जुर्म बे-शक सरज़द हुआ है हम से
इस को सग़ीरा समझो चाहे इसे कबीरा

मैदान-ए-हश्र तेरा कूचा बना है क़ातिल
जाता है अब जो कोई आता है क़शअरीरा

गिरवीदा कर लिया है नैरंगी-ए-नज़र ने
कैसी हुई फ़ुसूँ-गर वो शोख़ चश्म-गीरा

उस शोख़ दिल-रुबा पर क्यूँकर न हों फ़िदा हम
सज-धज हुई निराली बाँधा जो उस ने चीरा

मिन्नत-पज़ीर उस के आख़िर को हो गए हम
जो मुद्दआ' था अपना उस ने किया पज़ीरा

शाग़िल जो हो गए हैं महमूद आक़िबत हैं
सुल्ताना शग़्ल-ए-शब है दिन का हुआ नसीरा

थे शेफ़्ता जो 'साक़ी' इक मस्त-ए-नोश लब के
मयख़ाने ही के अंदर अपना बना ख़तीरा