मेरी महदूद बसारत का नतीजा निकला
आसमाँ मेरे तसव्वुर से भी हल्का निकला
रोज़-ए-अव्वल से है फ़ितरत का रक़ीब आदम-ज़ाद
धूप निकली तो मिरे जिस्म से साया निकला
सर-ए-दरिया था चराग़ाँ कि अजल रक़्स में थी
बुलबुला जब कोई टूटा तो शरारा निकला
बात जब थी कि सर-ए-शाम फ़रोज़ाँ होता
रात जब ख़त्म हुई सुब्ह का तारा निकला
मुद्दतों बा'द जो रोया हूँ तो ये सोचता हूँ
आज तो सीना-ए-सहरा से भी दरिया निकला
कुछ न था कुछ भी न था जब मिरे आसार खुदे
एक दिल था सो कई जगह से टूटा निकला
लोग शहपारा-ए-यक-जाई जिसे समझे थे
अपनी ख़ल्वत से जो निकला तो बिखरता निकला
मेरा ईसार मिरे ज़ो'म में बे-अज्र न था
और मैं अपनी अदालत में भी झूटा निकला
मैं तो समझा था बहुत सर्द है ज़ाहिद का मिज़ाज
उस के अंदर तो क़यामत का तमाशा निकला
वही बे-अंत ख़ला है वही बे-सम्त सफ़र
मेरा घर मेरे लिए आलम-ए-बाला निकला
ज़िंदगी रेत के ज़र्रात की गिनती थी 'नदीम'
क्या सितम है कि अदम भी वही सहरा निकला
ग़ज़ल
मेरी महदूद बसारत का नतीजा निकला
अहमद नदीम क़ासमी

