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मेरी दीवानगी नहीं जाती | शाही शायरी
meri diwangi nahin jati

ग़ज़ल

मेरी दीवानगी नहीं जाती

शकील बदायुनी

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मेरी दीवानगी नहीं जाती
रो रहा हूँ हँसी नहीं जाती

तेरे जल्वों से आश्कारा हूँ
चाँद की चाँदनी नहीं जाती

तर्क-ए-मय ही समझ ले ऐ नासेह
इतनी पी है कि पी नहीं जाती

जब से देखा है उन को बे-पर्दा
नख़वत-ए-आगही नहीं जाती

शोख़ी-ए-हुस्न-ए-बे-अमाँ की क़सम
हुस्न की सादगी नहीं जाती

उन की दरिया-दिली को क्या कहिए
मेरी तिश्ना-लबी नहीं जाती