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मेरी चाहत पे न इल्ज़ाम लगाओ लोगो | शाही शायरी
meri chahat pe na ilzam lagao logo

ग़ज़ल

मेरी चाहत पे न इल्ज़ाम लगाओ लोगो

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

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मेरी चाहत पे न इल्ज़ाम लगाओ लोगो
कुछ समझ कर ही उठाता है कोई बार-ए-गिराँ

पहले ज़र्रात-ए-ज़मीं-बोस का हमराज़ तो बन
फिर समझना बहुत आसाँ है सितारों की ज़बाँ

राज़-दार-ए-गुल-ओ-नसरीं तो हज़ारों थे मगर
कोई समझा ही नहीं बर्ग-ए-परेशाँ की ज़बाँ

फेंकती है तिरे 'शाहीन' पे दुनिया पत्थर
ना-गहाँ चूर न हो जाए ये शीशे का मकाँ