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मेरे रोने पर हँसी अच्छी नहीं | शाही शायरी
mere rone par hansi achchhi nahin

ग़ज़ल

मेरे रोने पर हँसी अच्छी नहीं

दत्तात्रिया कैफ़ी

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मेरे रोने पर हँसी अच्छी नहीं
बस जी बस ये दिल-लगी अच्छी नहीं

दिल लगी का भी न रोना हो कहीं
हर घड़ी की ये हँसी अच्छी नहीं

नाज़ुकी का उज़्र रहने दीजिए
बात ऐ जाँ बस यही अच्छी नहीं

आ के बैठा और जाने की पड़ी
बस यही तो ख़ू तिरी अच्छी नहीं

कौन सी 'कैफ़ी' बुरी है मुझ में बात
हाँ ये इक क़िस्मत मिरी अच्छी नहीं