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मेरे जिगर के दर्द का चारा कब आएगा | शाही शायरी
mere jigar ke dard ka chaara kab aaega

ग़ज़ल

मेरे जिगर के दर्द का चारा कब आएगा

सिराज औरंगाबादी

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मेरे जिगर के दर्द का चारा कब आएगा
यक-बार हो गया है दोबारा कब आएगा

पुतलियाँ मिरे नयन के झरोके में बैठ कर
बेकल हो झाँकती है पियारा कब आएगा

उस मुश्तरी-जबीं का मुझे ग़म हुआ ज़ुहल
ताले मिरे का नेक सितारा कब आएगा

मुरझा रही है दिल की कली ग़म की धूप में
गुलज़ार-ए-दिलबरी का हज़ारा कब आएगा

है शाद अपने फूल सीं हर बुलबुल ऐ 'सिराज'
वो यार-ए-नौ-बहार हमारा कब आएगा