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मेहनत कोशिश और वफ़ा के ख़ूगर ज़िंदा रहते हैं | शाही शायरी
mehnat koshish aur wafa ke KHugar zinda rahte hain

ग़ज़ल

मेहनत कोशिश और वफ़ा के ख़ूगर ज़िंदा रहते हैं

मुनव्वर हाशमी

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मेहनत कोशिश और वफ़ा के ख़ूगर ज़िंदा रहते हैं
जिन को मरना आ जाता है अक्सर ज़िंदा रहते हैं

फ़ितरत की वुसअ'त है कितनी कौन कहाँ तक देखेगा
आँखें मर जाती हैं लेकिन मंज़र ज़िंदा रहते हैं

पत्थर मारने वाले इक दिन ख़ुद पत्थर हो जाते हैं
राह-ए-वफ़ा में जो सहते हैं पत्थर ज़िंदा रहते हैं

हक़ की ख़ातिर पेश करें जो अपनी जान का नज़राना
ज़िंदा रहने वालों से भी बढ़ कर ज़िंदा रहते हैं

इक दिन पैदा करते हैं भौंचाल की सूरत जिस्मों में
लावे जज़्बों के सीने के अंदर ज़िंदा रहते हैं

जिन के दम से धरती रौशन रश्क-ए-फ़लक दिखलाई दे
ऐसे इंसाँ ऐसे माह-ओ-अख़तर ज़िंदा रहते हैं

ज़ुल्म के सैल-ए-ख़ूँ में इक दिन ज़ालिम भी बह जाता है
लश्कर मर जाता है और बेहतर ज़िंदा रहते हैं

ऐसे लोगों का मर जाना जीने से भी बेहतर है
वो जो लोग 'मुनव्वर' सब से डर कर ज़िंदा रहते हैं