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मौज-ए-सबा रवाँ हुई रक़्स-ए-जुनूँ भी चाहिए | शाही शायरी
mauj-e-saba rawan hui raqs-e-junun bhi chahiye

ग़ज़ल

मौज-ए-सबा रवाँ हुई रक़्स-ए-जुनूँ भी चाहिए

शकेब जलाली

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मौज-ए-सबा रवाँ हुई रक़्स-ए-जुनूँ भी चाहिए
ख़ेमा-ए-गुल के पास ही दजला-ए-ख़ूँ भी चाहिए

कश्मकश-ए-हयात है सादा-दिलों की बात है
ख़्वाहिश-ए-मर्ग भी नहीं ज़हर-ए-सुकूँ भी चाहिए

ज़र्ब-ए-ख़याल से कहाँ टूट सकेंगी बेड़ियाँ
फ़िक्र-ए-चमन के हम-रिकाब जोश-ए-जुनूँ भी चाहिए

नग़्मा-ए-शौक़ ख़ूब था एक कमी है मुतरिबा
शोला-ए-लब की ख़ैर हो सोज़-ए-दरूँ भी चाहिए

इतना करम तो कीजिए बुझता कँवल न दीजिए
ज़ख़्म-ए-जिगर के साथ ही दर्द-ए-फ़ुज़ूँ भी चाहिए

देखिए हम को ग़ौर से पूछिए अहल-ए-जौर से
रूह-ए-जमील के लिए हाल-ए-ज़बूँ भी चाहिए