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मौज-दर-मौज तो साहिल की रगों पर दौड़े | शाही शायरी
mauj-dar-mauj to sahil ki ragon par dauDe

ग़ज़ल

मौज-दर-मौज तो साहिल की रगों पर दौड़े

आमिर नज़र

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मौज-दर-मौज तो साहिल की रगों पर दौड़े
प्यास बुझ पाई नहीं लाख समुंदर दौड़े

शहर-ए-ईक़ान का हर कतबा गवाही देगा
वक़्त की पीठ पे उम्मीदों के लश्कर दौड़े

मेरे एहसास की चौखट पे उतर आए हैं
चंद ज़र्रे जो सर-ए-राह मचल कर दौड़े

तीरगी आज तिरी ज़ोर को हम देखेंगे
हाथ में नूर लिए तीरा मुक़द्दर दौड़े

लोग सच्चाई को तस्लीम करेंगे 'आमिर'
तख़्ता-ए-दार की जानिब जो तिरा सर दौड़े