मसाफ़तों में धूप और छाँव का सवाल क्या
सफ़र ही शर्त है तो फिर उरूज क्या ज़वाल क्या
फ़िराक़-साअ'तों के ज़ख़्म रूह तक पहुँच चुके
मयस्सर आएँ भी तो अब मसाई-ए-विसाल क्या
हुनर को धूप जंगलों की मुस्कुराहटों में है
गुलाब बस्तियों में हँसते रहने का कमाल क्या
उमीद ही तो दिल-शजर की आख़िरी असास थी
शगूफ़ा ये भी हो गया ख़िज़ाँ से पाएमाल क्या
तमाम-शहर ही हवा के दोश पर सवार है
दिखाए कोई ज़ख़्म क्या सुनाए कोई हाल क्या
ग़ज़ल
मसाफ़तों में धूप और छाँव का सवाल क्या
अरशद अब्दुल हमीद

